Friday, 10 March 2023
आज़ादी का अमृतकाल
Sunday, 27 November 2022
न्यू आज़ाद
नव उत्साह और नई उमंग है
नव विचार और नई सोच है,
नव दिशा और नई उड़ान है
नव हौंसले के साथ आई पैनल ये न्यू आज़ाद है।
नवाचार पेड़ी में करना जिसका मूलमंत्र है
नवयुग की तकनीकी लाना जिसका मूल उद्देश्य है,
नव हौंसले के साथ आई पैनल ये न्यू आज़ाद है।
नव ऊर्जा से भरे नवयुवक जिस पैनल की शान हैं
नवयौवन पेड़ी में लाना जिसका मूल संकल्प है,
नव हौंसले के साथ आई पैनल ये न्यू आज़ाद है।
नवनिर्माण पेड़ी में करना जिस पैनल ने ठाना है
नवजीवन पेड़ी को देना जिसका मूल इरादा है,
नव हौंसले के साथ आई पैनल ये न्यू आज़ाद है।
विकास हो या जय विकास,नहीं कर पाए कोई कल्याण
न्यू आज़ाद पर ही है अब भरोसा सबका अपरंपार
न्यू आज़ाद पर जब होगा इस पेड़ी का दारोमदार
विश्वास दिलाते हैं साथियों तभी होगा इस संस्था का उद्धार।
- सोनल तिवारी
Tuesday, 11 October 2022
महाकाल लोक
भारत के महान राजाओं ने पुरातन काल में अचंभित करने वाली वास्तुकला और शिल्पकारी से युक्त भव्य मंदिरों का निर्माण कराया जिन्हें बार बार मुग़ल आक्रांताओं द्वारा तोड़ा गया। ये हम इंदौर वासियों के लिए गर्व की बात है कि देश भर में ऐसे कई प्राचीन मंदिरों का पुनरुद्धार और पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराया गया था।
आज उसी परंपरा को जारी रखने का काम हमारे प्रधानमंत्री कर रहे हैं जो केदारनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, अयोध्या राम मंदिर, रामायण सर्किट, चारधाम प्रोजेक्ट और अब महाकाल लोक जैसी योजनाओं के साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर रहे हैं।
सन 1951 में हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने पुनर्निर्माण के बाद बने सोमनाथ मंदिर के ऐसे ही कार्यक्रम में अपनी धर्मनिरपेक्षता का हवाला देते हुए शिरकत करने से मना कर दिया था वहीं दूसरी ओर आज हमारे प्रधानमंत्री मोदीजी ने "जय महाकाल" के नारों से पूरे देश को गुंजायमान कर दिया। शायद यही वजह है कि दशकों से अनदेखी और अव्यवस्था झेल रहे इन प्राचीन हिंदू मंदिरों की सूरत अब बदल रही है क्योंकि देश अब बदल रहा है।
And we seriously don't need such hypocrite secular political parties or their leaders who did nothing for nourishing our cultural heritage just bcz of the fear of losing a particular vote bank, rather we need such fearless leaders who feel proud on our legacy. That's why apparently Modiji is the 1st PM who openly participate and encourage such cultural & religious events at such grand level. He is not afraid of anything when he does meditation in Amarnath cave or mantra chanting on a Rudraksh mala inside the Mahakal temple and this thing differentiates him from others .
Tuesday, 12 July 2022
मयखाना
होश वालों की कहां है कद्र अब मेरे शहर में
खुल गए हर मोड़ पर मयखाने अब मेरे शहर में!
ज़िंदगी छलक रही है बाहर जिन हाथों सेवो कहते हैं कि साग़र से छलकता जाम ही तो है!
शायद अपना अपना देखने का नज़रिया है
सारे ग़मज़दा शराबी तो नहीं,
वो कहते हैं कि पीते हैं ग़म भुलाने को!
शायद अपना अपना देखने का नज़रिया है
ज़िंदगी से बड़ी मसर्रत क्या होगी,
वो कहते हैं उन्हें सुरूर का शौक़ है!
शायद अपना अपना देखने का नज़रिया है
लड़खड़ाते कदमों से चले जाते हैं,
वो कहते हैं उन्हें शराब का ही सहारा है!
शायद अपना अपना देखने का नज़रिया है
नशा समाज की हर बुराई की जड़ है,
वो कहते हैं हुक़ूमत की कमाई का अहम ज़रिया है!
शायद अपना अपना देखने का नज़रिया है
सर झुकाकर निकलते हैं शरीफ़ जहाँ से,
वो कहते हैं नए ज़माने के नौजवानों का चलन है!
शायद अपना अपना देखने का नज़रिया है
निकलो ज़रा संभलकर हर गली कूचे से,
मदहोश है फिज़ा भी अब मेरे शहर में!
होश वालों की कहां है कद्र अब मेरे शहर में
खुल गए हर मोड़ पर मयखाने अब मेरे शहर में!
- सोनल"होशंगाबादी"
Retirement 1
उत्साह को नई उमंग दे दो
विचारों को नई दिशा दे दो,हौसलों को नई उड़ान दे दो
रास्ते जो पड़े हैं बरसों से सुनसान,
उन्हें मेरे आने की ख़बर दे दो।
मंज़िलें जो अनछुई हैं
बातें जो अनकही हैं
ख़ामोश लबों को मुस्कुराने की वजह दे दो,
उन्हें मेरे आने की ख़बर दे दो।
मेरे गांव में एक मकान है जो
हरा-भरा उसमें आम का बाग़ है जो
मेरे कदमों को अब उस घर का पता दे दो,
उन्हें मेरे आने की ख़बर दे दो।
बरसों निभा लिए दुनियावी दस्तूर
यूं ही चलते चलते आ गए कितनी दूर
थकान भरे इस सफ़र को फुरसतों का मज़ा दे दो,
उन्हें मेरे आने की ख़बर दे दो।
जिंदगी का ये मुकाम हासिल खुशकिस्मतों को है
कुछ साथी बिछड़ गए,कुछ अब भी मेरे हमराही हैं
मेरे इस काफिले को अब सुकून की पनाह दे दो,
उन्हें मेरे आने की ख़बर दे दो।
ओहदे की बंदिशें न रहीं अब
न वक्त की पाबंदियां हैं
मुझे अब मन-मर्जियां करने की इजाज़त दे दो,
उन्हें मेरे आने की ख़बर दे दो।
उन्हें मेरे आने की ख़बर दे दो।
-सोनल "होशंगाबादी"
Sunday, 26 June 2022
Level of Comedy
Yesterday watched Padmashri Surendra Sharma ji on d show Laughter challenge & obviously he doesn't need any introduction as we're already aware of his unique humuours style with a serious face. I think this Laughter challenge show will revive & uplift the standard of comedy. It's like a pill to get rid of those stereotyped Kapil Sharma jokes.
No doubt that Mr. Kapil Sharma has entertained us alot for last few yrs bt i think later on d channel & show makers focused on only sm specific content and a fixed style whr Men hv to be dressed & sound like female to do comedy, whr all d humour is created around a girl's big lips, whr nasty comments are easily allowed on someone's face, physique or complexion in d name of comedy, whr all the humour is dependent on d extent of wch d so called comedian can insult d other1.
Such shows hv degraded d level of comedy so much dt their cheap one-liners like "इसकी शकल तो तवे के हैंडल जैसी है" or "मेरे 5भाई बहन हैं क्योंकि मेरे पापा बेरोजगार थे" or another epic1 "लॉकडाउन में हमारे पास कोई काम नहीं था इसलिए हमने बच्चे पैदा कर लिए" these kind of dialogues are used in our movies also & d most dangerous part is dt sm parents are making & uploading videos of their kids on social media speaking such cheesy lines shamefully wch is not funny at all, atleast for me.
Now d Laughter challenge show has brought sm actual funny talented comedians on stage who are capable to make people laugh by their funny story telling, by sm situational comedy, by sm poetry with a social msg, by doing Wordplay in Hindi or other languages. it's like a much needed relief from all those shallow viral jokes.
Monday, 25 October 2021
अज्ञात नायक: टंट्या भील
सर्वविदित है कि भारतवर्ष के स्वाधीनता-संग्राम रुपी यज्ञ में असंख्य वीरों एवं वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी है I भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, वीर सावरकर, रानी लक्ष्मीबाई, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गाँधी, खुदीराम बोस, दादाभाई नौरोजी, तात्या टोपे, मंगल पांडे, अशफाक़उल्ला खान, लाला लाजपत राय, रामप्रसाद बिस्मिल, बाल गंगाधर तिलक, बिपिनचंद्र पाल इत्यादि अनेक महान नाम हैं जिनके बारे में हम इतिहास और शैक्षणिक पुस्तकों में पढ़ते आए हैं I परंतु इन नामों के अतिरिक्त भी ऐसे कई गुमनाम चेहरे हैं जिनके बारे में हमें इतिहास में अत्यधिक कम या लगभग न के बराबर जानकारी मिलती है, किंतु इतिहास की उपेक्षा देश के स्वतंत्रता संग्राम में दिए हमारे इन अज्ञात नायकों के अतुल्य बलिदान को किंचित भी कम न कर सकी I ऐसे ही एक दिलेर लेकिन गुमनाम स्वतंत्रता-सेनानी थे टंट्या भील जिन्हें टंट्या “मामा” के नाम से भी संबोधित किया जाता है I
आम लोगों की तरह मैं भी कुछ वर्ष पूर्व तक टंट्या भील के नाम से पूर्णतः अनभिज्ञ थी I टंट्या भील से मेरा परिचय हाल ही में वर्ष २०१९ में हुआ I इसे एक सुखद संयोग ही कहा जा सकता है कि जिस दिन इस क्रांतिकारी के बारे में मुझे जानने का अवसर मिला, वह २ अक्टूबर अर्थात गाँधी जयंती का पावन दिन था I अवकाश का दिन होने के कारण इस दिन मैने पातालपानी-कालाकुंड भ्रमण की आकस्मिक योजना बनाई I उस समय यात्रा का यह विकल्प हमारे लिए सबसे अनुकूल था क्योंकि मध्य प्रदेश पर्यटन निगम की ओर से पातालपानी व कालाकुंड की सैर के लिए एक विशेष हेरिटेज ट्रेन चलायी जाती है जो सुबह महू रेलवे स्टेशन से प्रस्थान करके पातालपानी होते हुए आखरी स्टेशन कालाकुंड पहुँचती है I ९.५किमी. लंबे इस मीटर गेज़ रेलवे ट्रैक पर चलते हुए ये ट्रेन कई सुरंगों और तीखे मोड़ों से गुज़रती है जिसमें बैठकर आप इसके पारदर्शी कोचों से सुंदर झरनों, कल-कल बहती चोरल नदी तथा विंध्याचल पर्वत की मनोरम प्राकृतिक छटा को जी भरकर निहार सकते हैं I इस प्राकृतिक सुंदरता के अतिरिक्त अंग्रेजों के समय बनाए गए इस रेलवे ट्रैक की एक और विशेषता है जिससे बहुत कम लोग ही वाकिफ़ हैं और वो है टंट्या भील का मंदिर .......
हमारी ट्रेन पातालपानी झरने पहुँचने ही वाली थी जिसका हम सभी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे कि सहसा तभी ट्रेन यकायक रुक गयी; हमें लगा कि शायद किसी तकनीकी ख़राबी की वजह से ऐसा हुआ है! तभी ट्रेन में मौजूद गाइड ने उस स्थल की जानकारी देना आरंभ किया जिसे उसने बड़े ही आदर-पूर्वक “टंट्या मामा” का मंदिर कहकर संबोधित किया I गाइड ने बताया कि ये एक अज्ञात लेकिन वीर क्रांतिकारी का बलिदान-स्थल है I वह एक छोटा झोपड़ीनुमा मंदिर था जिसमें टंट्या मामा की प्रतिमा स्थापित थी I ट्रेन में मौजूद बाकी सभी लोगों के समान मैं भी उस समाधि-स्थल एवं उससे जुड़ी महान शख्सियत से पूरी तरह अनजान थी I हमने उत्सुकतावश गाइड से उस मंदिर और टंट्या मामा के बारे में थोड़ा और विस्तार से बताने के लिए आग्रह किया जिसे उसने सम्मान-पूर्वक स्वीकार किया I
गाइड ने हमें बताया कि टंट्या भील एक महान आदिवासी जननायक थे जिन्हें अंग्रेजों ने “भारतीय रॉबिनहुड” नाम दिया था I टंट्या भील का जन्म मध्य प्रदेश के खंडवा ज़िले में हुआ था और पातालपानी उनका कर्म-स्थल था I माना जाता है कि खंडवा जिले की पंधाना तहसील के ग्राम बडदा में सन १८४२ में भील जनजाति के आदिवासी परिवार में टंट्या का जन्म हुआ था I भील मध्य प्रदेश की प्रमुख जनजातियों में से एक है जो गोंड व संथाल के बाद देश की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति भी है I वनों के क्षेत्रफ़ल के पैमाने पर मध्य प्रदेश देश में प्रथम स्थान पर आता है, यहाँ विंध्याचल और सतपुड़ा के घने जंगल दूर-दूर तक फ़ैले हुए हैं जिन पर कई प्रसिद्ध कविताएँ भी लिखी गयी हैं और इन्हीं सुदूर वनों में रहते हैं विभिन्न जनजातियों वाले आदिवासी समुदाय I आधुनिकता के इस दौर में भी ये आदिवासी समुदाय आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं; मध्य प्रदेश के कई वन्य-बहुल ज़िलों में ये आदिवासी समुदाय आज भी घने जंगलों में पारंपरिक तरीकों से ही जीवन-यापन करते हैं I ये आज भी अपनी प्राचीन संस्कृति को अक्षुण्ण रखे हुए हैं; ये जंगलों पर अपना अधिकार जताते हैं क्योंकि जंगलों से ही इनका इतिहास जुड़ा हुआ है I ये वनदेवी की पूजा करते हैं और वनों के रक्षक माने जाते हैं I
वनांचल में रहने वाले इन आदिवासी समुदाय के बालकों को बचपन से ही लाठी तथा तीर-कमान चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है I आज भी मध्य प्रदेश के बड़वानी एवं झाबुआ जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आपका सामना तीर-कमान धारी किसी आदिवासी युवक से हो सकता है I लिहाज़ा पिता भाऊसिंह ने टंट्या को भी बाल्यकाल से ही लाठी-गोफन व तीर-कमान चलाने का प्रशिक्षण देना प्रारंभ कर दिया और धीरे-धीरे बालक टंट्या ने लाठी चलाने व धर्नुविद्या में योग्यता प्राप्त कर ली I युवावस्था में अंग्रेजों के सहयोगी साहूकारों की प्रताड़ना से तंग आकर नौजवान टंट्या ने अपने साथियों के साथ जंगल से ही अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया I टंट्या एक गांव से दूसरे गांव घूमता रहा और अंग्रेजों से माल लूटकर गरीबों में बांटने लगा I
टंट्या भील के बाग़ी तेवरों की तपिश जल्दी ही ब्रिटिश हुकूमत को महसूस होने लगी I अमीरो से धन लूटकर गरीबों में बांटने के कारण अंग्रेज़ उसे आदिवासियों का “रॉबिनहुड” कहने लगे I ज्ञातव्य है कि रॉबिनहुड नामक पश्चिम में एक कुशल तलवारबाज और तीरंदाज था, जो अमीरो से माल लूटकर गरीबों में बांटता था I टंट्या भील के कारनामों और अदम्य साहस की भनक जब १८५७ की क्रांति के प्रणेता तात्या टोपे को लगी तो उन्होंने टंट्या भील को अंग्रेजों के खिलाफ़ गुरिल्ला युद्ध में पारंगत करने का निश्चय किया; गौरतलब है कि तात्या टोपे को गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में महारत हासिल थी I जंगल के इलाक़ों में युद्ध की गुरिल्ला तकनीक सबसे अधिक कारगर मानी जाती है I
तत्पश्चात टंट्या भील के नेतृत्व में बहादुर भीलों ने अनेक वर्षों तक अंग्रेजों से गुरिल्ला युद्ध किया । इन आदिवासी वीरों का संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के कुछ स्वर्णिम पृष्ठ हैं। शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की ग्यारह सालों तक नींद उड़ा देने वाला टंट्या भील अंग्रेजों की दृष्टि में एक डाकू था; लेकिन वर्षों पहले आदिवासियों व किसानों को साहूकार और जुल्मी सरकार के खिलाफ विद्रोह की प्रेरणा देने वाले टंट्या एक असाधारण वीर पुरुष थे । टंट्या भील आदिवासी और किसानों की क्रांति के पहले जननायक थे। उन्होंने आदिवासियों और किसानों में राष्ट्रीयता की भावना जगाई। टंट्या का प्रभाव मध्यप्रांत, खानदेश, होशंगाबाद, बैतुल, महाराष्ट्र के पर्वतीय क्षेत्रों के अलावा मालवा तक फ़ैल गया. टंट्या ने सरकारी रेलगाड़ी से ले जाया जा रहा अनाज लूटकर अकाल से पीड़ित लोगों में बंटवाया I शीघ्र ही वह लोगो के सुख-दुःख के भागी बन गए; निर्धन व असहाय लोगो की मदद करने से वह सबके चहेते बन गए और जनता उनकी पूजा करने लगी I इसके अलावा अनेक गरीब कन्याओं की शादी कराने के कारण लोग उन्हें ‘टंट्या मामा’ कहकर संबोधित करने लगे I उस समय जनमानस में यह विश्वास पैदा हो गया था कि टंट्या मामा के रहते कोई गरीब भूखा नहीं सोएगा I
टंट्या भील झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को अपना प्रेरणा-स्त्रोत मानते थे I अपने विद्रोही तेवर से उन्होंने बहुत कम समय में ही बड़ी पहचान हासिल कर ली थी I उन्होंने अंग्रेजों के शोषण तथा भारत में विदेशी हस्तक्षेप का सदैव खुलकर विरोध किया I उन्होंने ग़रीबों और अमीरों के बीच का भेद मिटाने के हर संभव प्रयास किये I अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले टंट्या मामा गरीबों की मदद करने के कारण इतने लोकप्रिय थे कि जब अंग्रेजों द्वारा उन्हें गिरफ्तार करके अदालत में पेश करने के लिए जबलपुर ले जाया गया तब टंट्या की एक झलक पाने के लिए जगह-जगह जनसैलाब उमड़ पड़ा था I इसके बाद टंट्या को फांसी की सजा सुनाई गयी और महू के पास पातालपानी के जंगल में उन्हें फाँसी पर लटकाया गया था, जहां पर आज इस ‘वीर पुरुष’ की समाधि बनी हुई है I विचित्र संयोग है कि जंगल में पैदा होने वाला एक भील आदिवासी जिसने जीवन भर जंगल में रहकर ही अंग्रेजों से लोहा लिया, उसने अपनी अंतिम सांस भी जंगल की आग़ोश में ही ली I
कहते हैं कि पातालपानी के जंगलों में टंट्या भील की आत्मा आज भी अमर है I यही वजह है कि इस रेलवे ट्रैक से गुजरने वाली हर रेलगाड़ी टंट्या मामा के मंदिर के सामने कुछ देर रूककर इस वीर शहीद को सलामी देती हैं I मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में आज भी इस आदिवासी नायक के साहस की कहानियां नाटक और लोकगीतों के माध्यम से प्रचलित हैंI
टंट्या मामा के बलिदान दिवस यानि ४दिसंबर के दिन वर्ष२०१४ में उनके जन्म-स्थान पंधाना में शहीद जननायक टंट्या भील अध्ययन केंद्र की स्थापना की गयी थी I इस शिक्षण संस्थान में आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभावान छात्र-छात्राओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की निःशुल्क तैयारी करवाई जाती है। वर्तमान में लगभग १करोड़ की लागत से इस संस्थान को और अधिक अत्याधुनिक बनाया जा रहा है जिसके अंतर्गत तक़रीबन १००विद्यार्थियों के यहां रहने व खाने की व्यवस्था भी की जाएगी। इस भवन के सामने टंट्या मामा की ५फीट ऊंची मूर्ति भी लगाई जाने की सरकार की योजना है।
भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में आदिवासियों की भूमिका के विषय में बहुत कम लिखा गया है जबकि वास्तविकता यह है कि इन जनजातीय समुदायों ने भी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष किया था I अंग्रेजों के खिलाफ़ आदिवासी विद्रोह का सर्वप्रथम उल्लेख हमें १७५७ के प्लासी के युद्ध के बाद मिलता है I आदिवासियों में सामाजिक एकजुटता थी और वे हर हाल में अपनी संस्कृति को विदेशी प्रभाव से बचाना चाहते थे I आदिवासी समुदाय की यही एकता और अपनी पुरातन संस्कृति से जुड़ाव हमें आज भी देखने को मिलता है I अपने अत्यंत सीमित संसाधनों के बावजूद आदिवासियों ने लंबे समय तक अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष किया एवं अपने गुरिल्ला युद्ध-कौशल के बल पर अंग्रेजों को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया I
टंट्या भील का नाम गुमनामी के अंधकार में छिपा एक ऐसा सितारा है जिसके प्रकाश से जन-जन को लाभान्वित होना चाहिए I